तुझे देख एक नज़र को
वो झलक देखना बस था
चाहा जाने दुं तेरे ख्यालों को
पर सोचना तुझे बेशक था
पहले जागते तारों को गिनने को
फिर इंतज़ार में तेरा बीतता वक़्त था
तुझे देख एक नज़र को
वो झलक देखना बस था
नज़रें मिली दिल की नब्ज़ बढ़ाने को
यहीं हाल था मेरा यही हाल रहा
पोरों को छुते छुते उंगलियों में उलझने को
यही दिल चाहता था चाहता रहा।
तुझे देख एक नज़र को
वो झलक देखना बस था
हर वक्त बैचेन तुझे देखने को
आंखों का तुझपे ही पयाम था
सोचा रफ्ता रफ्ता भूलूंगी तुझको
मिलने पर मुस्कुराना उसका सारे आम था
तुझे देख एक नज़र को
वो झलक देखना बस था
मिला तू मुझे मुकम्मल करने को
तेरे संग जो वक्त बिताता रहा
रक्स था वो बस कहने को
जो मैं था वो कहां मैं रहा।
तुझे देख एक नज़र को
वो झलक देखना बस था
दीक्षा साह