Saturday, October 11, 2025

आंखों आंखों में

तुझे देख एक नज़र को 

वो झलक देखना बस था


चाहा जाने दुं तेरे ख्यालों को 

पर सोचना तुझे बेशक था 

पहले जागते तारों को गिनने को 

फिर इंतज़ार में तेरा बीतता वक़्त था


 तुझे देख एक नज़र को 

वो झलक देखना बस था


नज़रें मिली दिल की नब्ज़ बढ़ाने को 

यहीं हाल था मेरा यही हाल रहा 

पोरों को छुते छुते उंगलियों में उलझने को 

यही दिल चाहता था चाहता रहा।


 तुझे देख एक नज़र को 

वो झलक देखना बस था


हर वक्त बैचेन तुझे देखने को 

आंखों का तुझपे ही पयाम था 

सोचा रफ्ता रफ्ता भूलूंगी तुझको 

मिलने पर मुस्कुराना उसका सारे आम था


 तुझे देख एक नज़र को 

वो झलक देखना बस था


मिला तू मुझे मुकम्मल करने को 

तेरे संग जो वक्त बिताता रहा 

रक्स था वो बस कहने को 

जो मैं था वो कहां मैं रहा।


 तुझे देख एक नज़र को 

वो झलक देखना बस था

                                               दीक्षा साह

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